पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

( Ra, La)

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Yogalakshmi - Raja  (Yogini, Yogi, Yoni/womb, Rakta/blood, Raktabeeja etc. )

Rajaka - Ratnadhaara (Rajaka, Rajata/silver, Raji, Rajju, Rati, Ratna/gem etc.)

Ratnapura - Rathabhrita(Ratnamaalaa, Ratha/chariot , rathantara etc.)

Rathaswana - Raakaa (Rathantara, Ramaa, Rambha, Rambhaa, Ravi, Rashmi, Rasa/taste, Raakaa etc.) 

Raakshasa - Raadhaa  (Raakshasa/demon, Raaga, Raajasuuya, Raajaa/king, Raatri/night, Raadhaa/Radha etc.)

Raapaana - Raavana (  Raama/Rama, Raameshwara/Rameshwar, Raavana/ Ravana etc. )

Raavaasana - Runda (Raashi/Rashi/constellation, Raasa, Raahu/Rahu, Rukmaangada, Rukmini, Ruchi etc.)

Rudra - Renukaa  (Rudra, Rudraaksha/Rudraksha, Ruru, Roopa/Rupa/form, Renukaa etc.)

Renukaa - Rochanaa (Revata, Revati, Revanta, Revaa, Raibhya, Raivata, Roga/disease etc. )

Rochamaana - Lakshmanaa ( Roma, Rohini, Rohita,  Lakshana/traits, Lakshmana etc. )

Lakshmi - Lava  ( Lakshmi, Lankaa/Lanka, Lambodara, Lalitaa/Lalita, Lava etc. )

Lavanga - Lumbhaka ( Lavana, Laangala, Likhita, Linga, Leelaa etc. )

Luuta - Louha (Lekha, Lekhaka/writer, Loka, Lokapaala, Lokaaloka, Lobha, Lomasha, Loha/iron, Lohit etc.)

 

 

 

राम कौन है?

                                               - राधा गुप्ता

राम भारतीय संस्कृति के प्राण हैं अर्थात् भारतीय संस्कृति में राम का स्थान वैसा ही जैसा मनुष्य शरीर में प्राणों का होता है। शरीर के समस्त अंग मस्तिष्क, यकृत, गुर्दे, पेट, आँतें, आँख, नाक, कान आदि सब ठीक-ठाक हों परन्तु शरीर में प्राण न हों, तब जो स्थिति शरीर की होती है, वही स्थिति भारतीय संस्कृति में राम की है। इसलिए यह जानना अति आवश्यक है कि राम हैं कौन? क्या वह एक मनुष्य हैं? क्या वह आत्मा हैं? क्या वह भगवान् हैं अथवा क्या वह कोई महापुरुष हैं?

     वाल्मीकि रामायण का गहन चिन्तन-मनन करने पर जो निष्कर्ष निकलता है उसके अनुसार राम उस उच्चतर चेतना का नाम है जब मनुष्य स्वयं को शरीर न समझकर आत्मा समझता है अर्थात् मैं प्रकाशस्वरूप, अजर, अमर, अविनाशी आत्मा हूं मनुष्य की इस पुनर्स्मृति, समझ अथवा ज्ञान का नाम राम है।

     प्रत्येक मनुषय आत्मा और शरीर का एक योग(जोड) है। शरीर सबको दिखाई देता है परन्तु इस शरीर को चलाने वाली शक्ति जिसे हम आत्मा कहते हैं, वह अदृश्य है, दिखाई नहीं देती। यह शक्ति या आत्मा केवल प्रकाशरूप है और मस्तिष्क के मध्य भाग (हाइपोथैलामस और पिट्यूटरी ग्रन्थि के मध्य में) विराजमान है। अति सूक्ष्म केवल प्रकाशरूप होने के कारण किसी यन्त्र के द्वारा भी इसको देखा जाना सम्भव नहीं है। शक्ति या आत्मा के निवास स्थान मस्तिष्क के इस सूक्ष्म मध्य भाग को शास्त्रों में हृदय-गुहा, हृद्देश अथवा हिरण्यय कोश कहा जाता है। शरीर के बाहरी तल अर्थात् मस्तक पर इसी स्थान को भ्रूमध्य भी कहा जाता है। यद्यपि यह शक्ति या आत्मा अतिसूक्ष्म है और स्थूल नेत्रों से दिखाई नहीं देती, फिर भी मन-बुद्धि के नेत्रों से ज्योतिर्बिन्दुस्वरूप इस शक्ति या आत्मा पर ध्यान केन्द्रित करके इसका दर्शन किया जा सकता है।

     चूंकि यह शक्ति ही शरीर रूपी जड यन्त्र को क्रियाशील बनाती है, इसलिए शरीर को चलता फिरता क्रियाशील देखकर धीरे धीरे मनुष्य इस शक्ति को तो भूल जाता है और शरीर को ही सब कुछ समझकर अपने को शरीर ही समझने लगता है। यही मनुष्य का गहरा अज्ञान है और इस मूलभूत अज्ञान से ही अनेक प्रकार का अज्ञान उत्पन्न हो जाता है।

     जिस दिन मनुष्य अपने सही स्वरूप आत्मा को जान लेता है, पहचान लेता है  - उसी दिन राम हो जाता है। अपने सही स्वरूप आत्मस्वरूप को जान लेने वाला प्रत्येक मनुष्य राम है। इस भारतभूमि पर अनेक मनुष्यों ने अपने वास्तविक स्वरूप आत्मस्वरूप को जाना है, इसलिए भारतभूमि रामभूमि है। वास्तव में राम किसी एक मनुष्य का वाचक नहीं। राम एक उच्चतर चेतना मैं चैतन्य शक्ति आत्मा हूं का वाचक है और मनुष्य के भीतर इस उच्चतर चेतना का अवतरण ही राम का अवतरण है।

राम वृक्ष के मूल में बैठते हैं, मूल का भोजन करते हैं

-         राधा गुप्ता

मूल का अर्थ है जड। किसी भी विस्तार की जड में पहुँचना अर्थात् किसी भी बात के विस्तार को देखकर भी उसके मूल पर दृष्टि रखना। केवल ऊपर ऊपर से किसी बात को न देखना, सर्वदा उसके मूल कारण को पकडना। उदाहरण के लिए यदि किसी को क्रोध आता है और वह उस क्रोध को समाप्त करना चाहता है, तब ऊपर ऊपर से केवल उस क्रोध के स्वरूप को देखकर उसे समाप्त नहीं किया जा सकता। क्रोध के आने का मूल क्या है उसे यदि पकडा जाए, तब ही क्रोध को समाप्त किया जा सकता है। आत्मस्वरूप में स्थित मनुष्य प्रत्येक परिस्थिति में मूल को पकडता है, इसलिए शीघ्रता और सरलता से समस्या के समाधान तक पहुँच जाता है। राम द्वारा मूल का भोजन करना भी मूल पर ध्यान देने को इंगित करता है।

राम फल खाते हैं

फल सात्त्विक भोजन को इंगित करता है। जैसे स्थूल शरीर का सात्त्विक भोजन फल है, मन का सात्त्विक भोजन सकारात्मक सूचनाएँ हैं, उसी प्रकार आत्मा का सात्त्विक भोजन पवित्र, उच्च, श्रेष्ठ विचार हैं। आत्मस्मृति/आत्मस्वरूप में स्थित मनुष्य सदैव पवित्र एवं श्रेष्ठ विचारों को ही खाता अर्थात् अपने भीतर धारण करता है। अथवा ऐसा भी कहा जा सकता है कि जैसे वृक्ष का सार तत्त्व है उसका फल, उसी प्रकार जीवन का सार तत्त्व है सुख-शान्ति-प्रेम तथा आनन्द को सबके बीच बाँटने का उच्चतम विचार या भाव। इस सार तत्त्व को अपने भीतर अर्थात् मन-बुद्धि-चित्त में धारण करना ही राम द्वारा फल को खाना है।

राम कन्द का भोजन करते हैं

     पृथ्वी के भीतर पैदा होने वाला फल कन्द कहलाता है। पृथ्वी को खोदकर ही इसे प्राप्त किया जा सकता है। आध्यात्मिक स्तर पर मन-बुद्धि को भी पृथ्वी कहा गया है, जिसके भीतर ज्ञान रूपी कन्द विद्यमान हैं। आत्मस्थ मनुष्य मन-बुद्धि रूपी पृथ्वी को खोद खोद कर इन ज्ञान-कन्दों को खाता है अर्थात् ज्ञान रूपी कन्दों को अपने जीवन में धारण करता है अथवा आचरण में लाता है।

राम द्वारा वल्कल वस्त्र धारण

     वल्कल शब्द वर (वल्) और कर(कल) नामक दो शब्दों से बना प्रतीत होता है। वर का अर्थ है श्रेष्ठ तथा कर का अर्थ है करना या कर्म। अतः वल्कल का अर्थ हुआ श्रेष्ठ करना या श्रेष्ठ कर्म। आत्मस्मृति/आत्मस्वरूप में स्थित मनुष्य श्रेष्ठ कर्म को उसी प्रकार धारण करता है जैसे कोई सूत से बने वस्त्रों को।

     कथा में कहा गया है कि वनगमन के समय कैकेयी ने राम को वल्कल वस्त्र धारण करने का आदेश दिया और राम ने उन वस्त्रों को धारण कर लिया। िस कथन द्वारा यह संकेतित किया गया है कि अपने ही चित्त/अवचेतन मन रूपी वन में बैठे हुए संस्कार रूपी राक्षसों का वध केवल तभी किया जा सकता है जब आत्मस्थ मनुष्य श्रेष्ठ कर्म को धारण करे। कर्म का सबसे पहला स्वरूप मानसिक होता है। वाचिक और कायिक भी उस मानसिक कर्म का ही अनुसरण करते हैं। आत्मस्थ हुए बिना और श्रेष्ठ कर्म को धारण किए बिना अपने ही राक्षसी संस्कारों का विनाश असम्भव है।
प्रथम लेखन : 5-3-2014ई.(फाल्गुन शुक्ल पञ्चमी, विक्रम संवत् 2070)

 

MANIFESTATION OF SELF KNOWLEDGE

 IS

MANIFESTATION OF RAMA

-         Radha Gupta

Every person is a combination of two – the body and the soul. Body is like a chariot and soul is like charioteer. A chariot controlled by a charioteer serves all purpose that a charioteer wishes. But in the long journey of birth and death, a person forgets his real self and thinks himself a chariot(body) instead of a charioteer(soul). This thought is a deep sleep which brings him sorrow, because a sleeping driver never handles a car properly and it makes the life miserable making so many  accidents.

            The day a person awakens and remembers his real self, he again becomes the charioteer of his chariot. This awakening is called Self Knowledge. To know own self is a special consciousness called Rama.

राम का अवतरण

अर्थात्

आत्मज्ञान का अवतरण

-         राधा गुप्ता

प्रत्येक मनुष्य शरीर और आत्मा का एक योग है। शरीर जड है परन्तु आत्मा चेतन। शरीर विनाशी है विनष्ट होता है परन्तु आत्मा अविनाशी कभी विनष्ट नहीं होती। शरीर स्थूल है परन्तु आत्मा अतिसूक्ष्म ज्योतिर्बिन्दु स्वरूप। शरीर सभी को दिखाई देता है परन्तु आत्मा दिखाई नहीं देती, इसे केवल मन बुद्धि के नेत्रों से ही देखा जा सकता है। शरीर एक रथ की भांति है परन्तु आत्मा उस रथ को चलाने वाली एक शक्ति है उस रथ का रथी।

      कालचक्र के प्रवाह में पडा हुआ मनुष्य एक दिन शरीर और आत्मा के उपर्युक्त वर्णित अविच्छिन्न सम्बन्ध को भूल जाता है और स्वयं को शरीर रूप रथ को चलाने वाला रथी न मानकर रथ ही मानने लगता है। अपने वास्तविक आत्मस्वरूप की यह विस्मृति ही मनुष्य का गहरा अज्ञान है, उसकी गहन मूर्च्छा है अथवा उसका अज्ञान निद्रा में सो जाना है। स्व स्वरूप की इस विस्मृति से मनुष्य के जीवन की दशा वैसी ही हो जाती है जैसी किसी मूर्च्छित अथवा निद्रित रथी द्वारा चलने वाले एक रथ की । जिस प्रकार यदि रथी मूर्च्छा में है अथवा नींद में है, तब रथ सुचारु रूप से नियन्त्रण में न होने के कारण अपने गन्तव्य तक नहीं जा पाता, उसी प्रकार अज्ञानी मनुष्य यह न जानने के कारण कि मैं वास्तव में कौन हूं अर्थात् रथी के मूर्च्छित होने के कारण अपने जीवन रूपी रथ को सुचारु रूप से नहीं चला पाता और बहुत प्रयत्न करने पर भी अपने जीवन के उद्देश्य को ही नहीं समझ पाता, उद्देश्य तक पहुंचने की बात तो दूर रही।

      मनुष्य चाहे जाने अथवा न जाने, आत्मा रूप रथी तो सदैव है और वही मस्तिष्क के एक विशेष स्थान योग के अनुसार भ्रूमध्य में बैठकर इस शरीर रूपी रथ को चलाता है। जिस दिन यह ज्ञान, यह समझ, यह स्मृति मनश्चेतना में अवतरित होती है कि वह आत्मा रूप रथी मैं ही हूं, मैं ही इस शरीर रूप रथ को चलाता हूं और अपनी इच्छा से इस शरीर रूप रथ को जिधर चाहूं, उधर ले जा सकता हूं उसी दिन से जीवन में परिवर्तन सा हो जाता है और मनुष्य की जीवन यात्रा दुःख से हटकर सुख की ओर अग्रसर होने लगती है। स्व स्वरूप के इस ज्ञान, समझ अथवा स्मृति का मनश्चेतना में अवतरण ही राम का अवतरण है।

      अवतरण का अर्थ है- उतरना, प्रकट होना अथवा उदय होना। मैं अजर अमर अविनाशी ज्योतिर्बिन्दु आत्मा हूं यह स्मृति, यह ज्ञान मन बुद्धि में उदित हो जाना अथवा प्रकट हो जाना ही दशरथ के घर में राम का अवतरण है।

ANCESTORS OF RAMA  

MEANS

DIFFERENT STATES OF CONSCIOUSNESS

-         Radha Gupta

Knowing Self is a higher state of consciousness. This is awakening from deep sleep. This is also a transformation of consciousness from body to soul. But this transformation does not occur suddenly. A person has to go through number of steps to reach this state. All these steps are the different states of consciousness and are symbolized as ancestors of Rama.

            At first step, a person becomes free from worldly desires. This state of consciousness is said as Vivasvan in pauranic literature. Vivasvan is Aditya(son of Aditi) which is a synonym of sun. Therefore this first state of consciousness prior to self knowledge is first ancestor of Rama and that is why Rama is called Suryavanshi.

            Introspection is the second step prior to self knowledge. Being introspective a person is able to see all his waste and negative thoughts wandering in his mind. He knows that his own thoughts are destroying divinity of his personality. He becomes aware and tries his best to be free from it. This state of consciousness is called Ikshwaku and based on this state, Rama is called Ikshwakuvanshi.

            Introspection makes a person totally aware of his own thoughts and slowly the mind gets filled with elevated positive thoughts. This is third step and this state of consciousness is called Kakutstha in pauranic literature. Depending on this state, Rama is called as Kaakutstha.

            Passing through these steps, a person attains next state of consciousness called Raghu. Raghu means to overcome all ill situations spontaneously. Based on this state, Rama is called Raghuvanshi.

            These states make the mind pure, peaceful and stable. This state of consciousness is called Dasharatha – Father of Rama. This is the last step prior to self – knowledge. Inspired with his pure inner consciousness, a pure and stable mind craves strongly to know his own self. At last, the knowledge of self manifests which is manifestation of Rama.

राम के पूर्वज

अर्थात्

आत्म-ज्ञान के अवतरण से पूर्व चेतना की विभिन्न स्थितियां

-         राधा गुप्ता

यह एक सर्वविदित तथ्य है कि देह ज्ञान अर्थात् मैं देह हूं इस ज्ञान में रहते हुए आत्मज्ञान अर्थात् मैं अजर-अमर-अविनाशी ज्योतिर्बिन्दु स्वरूप आत्मा हूं, इस ज्ञान का प्रकटन अकस्मात् नहीं होता। मनुष्य की चेतना धीरे धीरे ऊंचाई की ओर अग्रसर होती हुई एक दिन आत्मज्ञान में अवस्थित हो पाती है। अथवा ऐसा भी कह सकते हैं कि आत्मज्ञान चेतना के आरोहण का ऊपरी सोपान है। जैसे सीढी के एक एक सोपान को पार करके ही ऊपरी सोपान तक पहुंचा जा सकता है, उसी प्रकार आत्मज्ञान रूपी ऊपरी सोपान तक पहुंचने के लिए भी मनुष्य को मनश्चेतना की विभिन्न स्थितियों को पार करना पडता है। मनश्चेतना की इन विभिन्न स्थितियों को ही पौराणिक साहित्य में राम के पूर्वज कहकर इंगित किया गया है। पूर्वज शब्द पूर्व तथा ज(जायते) नामक दो शब्दों के योग से बना है। पूर्व का अर्थ है पहले और ज(जायते) का अर्थ है होना या घटित। अतः पूर्वज का अर्थ हुआ- राम रूप आत्मज्ञान के अवतरण से पहले होने वाली मनश्चेतना की विभिन्न स्थितियां। पौराणिक साहित्य में ये स्थितियां वंशावली के नाम से भी उल्लिखित हैं । यथा अदिति कश्यप विवस्वान् वैवस्वत मनु इक्ष्वाकु विकुक्षि(शशाद) ककुदस्थ(पुरञ्जय) खट्वांग दिलीप रघु अज दशरथ राम

      चूंकि यह वंशावली मनश्चेतना की ही विभिन्न स्थितियां हैं, अतः प्रमुख प्रमुख स्थितियों के आधार पर राम को सूर्यवंशी(विवस्वान् स्थिति), इक्ष्वाकुवंशी(इक्ष्वाकु स्थिति), काकुत्स्थ(ककुत्स्थ स्थिति), रघुवंशी(रघु स्थिति) तथा दाशरथि(दशरथ पुत्र) कहा गया है। तात्पर्य यह है कि राम रूपी आत्मज्ञान के अवतरण हेतु व्यक्तित्व में आत्मसात् करने योग्य अनिवार्य स्थितियों को ही राम के पूर्वज या वंशज कहकर संकेतित किया गया है।

      राम रूप आत्मज्ञान के अवतरण हेतु सबसे पहली अनिवार्यता है विवस्वान् स्थिति अर्थात् मन का(मनुष्य का) जागतिक वासनाओं से रहित होना। पौराणिक साहित्य में कश्यप और अदिति के विवस्वान्, वामन, इन्द्र, सविता, पूषा तथा त्वष्टा आदि १२ पुत्रों को अदिति के पुत्र होने से आदित्य कहा गया है। अदिति मनुष्य की अखण्डित चेतना(शरीर और आत्मा के योग में स्थित) की प्रतीक है। अतः अदिति के ये १२ पुत्र आदित्य वास्तव में अखण्डित चेतना के १२ गुणों को इंगित करते हैं।  पहला गुण है विवस्वान् अर्थात् वासना रहितता, दूसरा गुण है वामन अर्थात् आत्मस्थ मन की सूक्ष्मता, तीसरा गुण है इन्द्र अर्थात् मन की शुद्धता, चौथा गुण है सविता अर्थात् उत्पादकता, पांचवां गुण है पूषा अर्थात् पोषणकर्म, छठां गुण है त्वष्टा अर्थात् व्यक्तित्व में काटछांट करके उसका नवनिर्माण करना, सातवां गुण है धाता अर्थात् अस्तित्व के प्रति स्वीकार्यता, आठवां गुण है विधाता अर्थात् अपने भाग्य का निर्माता होना, नवां गुण है भग अर्थात् पूर्वजन्म के कर्म रूप बीजों से कृषि करना, दसवां गुण है अर्यमा अर्थात् यम नियम में सहज स्थिति, ग्यारहवां गुण है मित्र अर्थात् दिव्यता के कारण सबका मित्र और बारहवां गुण है वरुण अर्थात् दैवी आसुरी चेतना का अधिपति होना। आदित्य शब्द सूर्य का भी पर्यायवाची है। अतः इस विवस्वान् स्थिति के आधार पर ही राम को सूर्यवंशी कहा गया है।

      राम रूप आत्मज्ञान के अवतरण हेतु दूसरी अनिवार्यता है इक्ष्वाकु स्थिति अर्थात् मन(मनुष्य) का अन्तर्द्रष्टा होना। इक्ष्वाकु शब्द इक्ष् धातु में वाक् शब्द के योग से बना है। इक्ष् का अर्थ है देखना और वाक् का अर्थ है पश्यन्ती वाक् अर्थात् भीतर की ओर देखने वाली मनःशक्ति।  जब व्यक्तित्व विवस्वान् अर्थात् जागतिक वासना से रहित हो जाता है, तब उसमें इक्ष्वाकु अर्थात् अन्तर्दर्शन की सामर्थ्य जाग्रत होती है। अन्तर्द्रष्टा होने पर मनुष्य अपने ही मन के भीतर रहने वाले उस विचार-संग्रह को स्पष्ट रूप से देखने में समर्थ हो जाता है जिसे उसने ही जन्म-जन्मान्तरों की यात्रा में अर्जित विभिन्न मान्यताओं, धारणाओं तथा अनुभवों के आधार पर संग्रहीत किया है। अन्तर्द्रष्टा होकर मनुष्य अपनी ऊर्ध्वमुखी चेतना जिसे पौराणिक साहित्य में वसिष्ठ कहा गया है की सहायता से अन्तर्मन में पडे हुए व्यर्थ, अनुपयोगी, नकारात्मक विचार-संग्रह को बाहर निकाल देता है। इस व्यर्थ और नकारात्मक विचार-संग्रह को ही भागवत पुराण नवम स्कन्ध अध्याय ६ में इक्ष्वाकु कथा के अन्तर्गत विकुक्षि नाम दिया गया है जो व्यक्तित्व की दिव्यता को खा लेने अथवा नष्ट करने के कारण शशाद भी कहा गया है। शशाद शब्द शश और आद् नामक दो शब्दों के योग से बना है। शश शब्द का अर्थ है चन्द्रमा का प्रकाश अर्थात् मन या व्यक्तित्व की दिव्यता और आद्(अत्ति धातु से निर्मित) का अर्थ है खा लेने वाला। अतः शशाद का अर्थ हुआ मन की दिव्यता को खा लेने या नष्ट कर देने वाला। तात्पर्य यह है कि अन्तर्दर्शन की सामर्थ्य से युक्त होने पर ही मनुष्य अपने व्यक्तित्व की दिव्यता को नष्ट करने वाले नकारात्मक विचारों को मन के राज्य से बाहर निकाल फेंकता है। इस इक्ष्वाकु स्थिति के आधार पर ही राम को इक्ष्वाकुवंशी कहा गया है।

      राम रूप आत्म-ज्ञान के अवतरण हेतु तीसरी अनिवार्यता है ककुत्स्थ अथवा पुरञ्जय स्थिति। ककुत्स्थ(ककुद् स्थ) का अर्थ है श्रेष्ठ विचारों की स्थिति। मन के क्षेत्र से नकारात्मक विचार संग्रह के बाहर निकल जाने पर अब मनुष्य का मन सकारात्मक श्रेष्ठ विचारों में रमने लगता है। इसी स्थिति के कारण राम को ककुत्स्थ वंशी अतः काकुत्स्थ कहा गया है। श्रेष्ठ विचारों में रहने का अर्थ है- व्यर्थ विचारों पर विजय। इसीलिए पौराणिक साहित्य में ककुत्स्थ को पुरञ्जय नाम भी दिया गया है।

      राम रूप आत्मज्ञान के अवतरण हेतु चौथी अनिवार्यता है रघु स्थिति। रघु शब्द लंघ् धातु में कु के योग से बना है। लंघ् के ल का र होकर न का लोप हो जाने से रघु शब्द घटित हुआ है और इसका अर्थ है परे चले जाना अथवा अतिक्रमण करना। श्रेष्ठ विचारों में स्थित हो जाने पर अर्थात् ककुत्स्थ होने पर मनुष्य अपने जीवन में उपस्थित हुई विपरीत स्थितियों का सहज रूप से अतिक्रमण करने लगता है। सुखी जीवन के लिए यह एक अत्यन्त मह्त्वपूर्ण स्थिति है, अतः इस रघु स्थिति के आधार पर ही राम को रघुवंशी कहा गया है। पौराणिक साहित्य में रघु के विषय में कथित कौत्स ऋषि की कथा भी उपर्युक्त तथ्य को ही पुष्ट करती है क्योंकि कौत्स(अधम या तिरस्करणीय अर्थ वाले कुत्सा शब्द से निर्मित) ऋषि का अर्थ ही है विपरीत स्थिति।

      राम रूप आत्मज्ञान के अवतरण हेतु पांचवी और अन्तिम अनिवार्यता है दशरथ अर्थात् दशरथ स्थिति जो राम(आत्म-ज्ञान) के जनक(पिता) ही हैं। दशरथ स्थिति का तात्पर्य यह है कि उपर्युक्त वर्णित चारों स्थितियों विवस्वान् अर्थात् वासना रहित स्थिति, इक्ष्वाकु अर्थात् अन्तर्दर्शन की सामर्थ्य, ककुत्स्थ अर्थात् श्रेष्ठ विचारों का संधारण तथा रघु अर्थात् विपरीत स्थितियों के अतिक्रमण की सामर्थ्य को क्रमशः पार करते हुए एक शान्त, शुद्ध, स्थिर मन का निर्माण होता है। यह शान्त, शुद्ध, स्थिर मन जिस समय आत्म ज्ञान प्राप्ति(पुत्र प्राप्ति) की उत्कट लालसा से युक्त होता है और उसकी प्राप्ति के लिए अन्तःस्फूर्त्त चेतना से प्रेरित होकर साक्षी भाव में स्थित हो जाता है उस स्थिति में ही एक विशिष्ट चेतना का अवतरण होता है जो मनुष्य को उसके वास्तविक आत्म-स्वरूप - मैं अजर-अमर-अविनाशी ज्योतिर्बिन्दु स्वरूप आत्मा हूं  - इस संकल्प में अवस्थित कराती है। मन-बुद्धि में इस विशिष्ट चेतना अथवा आत्मज्ञान का अवतरण ही दशरथ के घर में राम का अवतरण है।

      सार रूप में यह कहा जा सकता है कि जब तक मनुष्य का मन बहिर्मुखी बना रहता है, अर्थात् जागतिक-भौतिक पदार्थों की वासना-लालसा में फंसा रहता है, तब तक स्व को जानने अर्थात् मैं कौन हूं, यह जानने के लिए उत्सुक नहीं होता । परन्तु जैसे ही वह मन जागतिक कामनाओं से मुक्त होता है, अर्थात् विवस्वान् बनता है, वैसे ही वह अन्तर्द्रष्टा होकर अपने भीतर चलने वाले भांति-भांति के विचारों को भी देखने लगता है, अर्थात् इक्ष्वाकु बन जाता है। अन्तर्द्रष्टा होने पर ही वह देख पाता है कि नाना प्रकार की धारणाओं एवं मान्यताओं के कारण उत्पन्न हुए नकारात्मक संकल्पों, विचारों अथवा भावों का एक विशाल संग्रह वह अपने ही अन्तर में छिपाए हुए है(विकुक्षि स्थिति) जो उसके मन की दिव्यता को खाता अर्थात् नष्ट करता रहता है(शशाद) । परन्तु शनैः शनैः अपनी ही ऊर्ध्वमुखी चेतना(वसिष्ठ) से प्रेरित होकर मनुष्य का वह अन्तर्द्रष्टा मन(इक्ष्वाकु) जब उस विचार संग्रह(विकुक्षि) को अपने आन्तरिक राज्य(मन) से बाहर निकाल देता है, तब विचारों के पुर को जीतने वाला अर्थात् पुरञ्जय बन जाता है। यह एक ककुद् अर्थात् ऊंची स्थिति है, इसलिए इस स्थिति को ककुत्स्थ अर्थात् श्रेष्ठ विचारों में स्थिति भी कहा गया है। श्रेष्ठ विचारों में स्थित मनुष्य शनैः शनैः जीवन में उपस्थित होने वाली विपरीत स्थितियों का अतिक्रमण या लंघन करने में समर्थ हो जाता है(रघु स्थिति) और फलस्वरूप अत्यन्त शान्त, शुद्ध तथा स्थिर भाव(दशरथ) को प्राप्त हो जाता है। इस शान्त, शुद्ध तथा स्थिर मन में ही आत्म ज्ञान प्राप्ति(पुत्र - प्राप्ति) की प्रगाढ इच्छा उत्पन्न होती है तथा अन्तःस्फूर्त्त चेतना से प्रेरित होकर साक्षी भाव के प्रकट होने पर एक दिन आत्मज्ञान अर्थात् मैं शरीर नहीं हूं अपितु इस शरीर रूपी यन्त्र को चलाने वाली एक चैतन्य शक्ति आत्मा हूं का उदय होता है जिसे दशरथ के घर में राम का जन्म होना कहा गया है।    

प्रथम लेखन 24-2-2012(फाल्गुन कृष्ण सप्तमी, विक्रम संवत् 2067)