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पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

( Ra, La)

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Yogalakshmi - Raja  (Yogini, Yogi, Yoni/womb, Rakta/blood, Raktabeeja etc. )

Rajaka - Ratnadhaara (Rajaka, Rajata/silver, Raji, Rajju, Rati, Ratna/gem etc.)

Ratnapura - Rathabhrita(Ratnamaalaa, Ratha/chariot , rathantara etc.)

Rathaswana - Raakaa (Rathantara, Ramaa, Rambha, Rambhaa, Ravi, Rashmi, Rasa/taste, Raakaa etc.) 

Raakshasa - Raadhaa  (Raakshasa/demon, Raaga, Raajasuuya, Raajaa/king, Raatri/night, Raadhaa/Radha etc.)

Raapaana - Raavana (  Raama/Rama, Raameshwara/Rameshwar, Raavana/ Ravana etc. )

Raavaasana - Runda (Raashi/Rashi/constellation, Raasa, Raahu/Rahu, Rukmaangada, Rukmini, Ruchi etc.)

Rudra - Renukaa  (Rudra, Rudraaksha/Rudraksha, Ruru, Roopa/Rupa/form, Renukaa etc.)

Renukaa - Rochanaa (Revata, Revati, Revanta, Revaa, Raibhya, Raivata, Roga/disease etc. )

Rochamaana - Lakshmanaa ( Roma, Rohini, Rohita,  Lakshana/traits, Lakshmana etc. )

Lakshmi - Lava  ( Lakshmi, Lankaa/Lanka, Lambodara, Lalitaa/Lalita, Lava etc. )

Lavanga - Lumbhaka ( Lavana, Laangala, Likhita, Linga, Leelaa etc. )

Luuta - Louha (Lekha, Lekhaka/writer, Loka, Lokapaala, Lokaaloka, Lobha, Lomasha, Loha/iron, Lohit etc.)

 

 

No satisfactory explanation is available at present why Seetaa gave birth to her sons Kusha and Lava in the hermitage of Vaalmeeki. Even the interpretation of the names mentioned in Raamaayana itself can not be deciphered. As has been stated in the comments on Seetaa, the hermitage of sage Vaalmeeki represents the state where Seetaa is protected with an armor, the armor of sacrifices, the armor of gods. Fabrication of an armor in this way is too common in puraanic literature. Word Lava is Vala with letters reversed. Vala may be an aura around the body. This aura has to be pierced to absorb it in the body. This will create gems inside the body. Rigveda mentions Rava, not Lava which can pierce Vala. In Sanskrit, Rava is the name of noise. How Rava can be equated with Lava, is yet to be seen. May be the power at mortal level has been called Rava/Lava.

Comments on Smriti/Kusha

First published : 31-8-07

लव

टिप्पणी : वैदिक पदानुक्रम कोश तथा यास्क निरुक्त ३.५ में लव शब्द की निरुक्ति लु - लवने/काटने व लीन होने (लीयते) के द्वारा की गई है । लव को समझने की एक कुञ्जी हमें महाभारत में बल्लव शब्द से प्राप्त होती है । विराट के नगर में अज्ञातवास करते समय भीम ने वहां बल्लव नाम से सूदकार/रसोईये का काम करते हुए निवास किया था । श्रीमती राधा गुप्ता ने बल्लव का अर्थ बल को सूक्ष्म बनाना किया है ( द्र. विराट पर टिप्पणी ) । लव को समझने से पूर्व हमें बल/वल शब्द को समझना होगा । लव शब्द वल का उल्टा है । वैदिक व पौराणिक साहित्य में वल असुर का आख्यान आता है । वल असुर गायों को चुरा लेता है । इन्द्र अपने वज्र से वल का संहार करता है । वल असुर के  अंग जब पृथिवी पर गिरते हैं तो उनसे रत्नों की उत्पत्ति होती है । वल शब्द के बारे में अनुमान है कि यह मुख आदि के परितः अवस्थित आभामण्डल का द्योतक है( वाल वृक्ष के मूल के परितः बनाए गए थांवले को कहते हैं जो जल का संरक्षण करता है ) । ऋग्वेद की कईं ऋचाओं जैसे १.६२.४, ४.५०.५, १०.६७.६ आदि में वल का रव के द्वारा विदारण करने के उल्लेख आते हैं । रव शब्द में र अग्नि/सूर्य का द्योतक है जिसे पृथिवी तत्त्व के द्योतक लव में रूपान्तरित किया जा सकता है । सूर्य की पृथिवी पर पहुंचने वाली किरणों को रव कहा जा सकता है । ऋचाओं से संकेत मिलता है कि अग्नि और सूर्य का रव अलग - अलग प्रकार का होता है । ऋग्वेद की ऋचाओं से ऐसा प्रतीत होता है कि रव का उपयोग पृथिवी पर स्थित बाधाओं को दूर करने के लिए किया जा सकता है । ऋग्वेद ४.५०.४/तैत्तिरीय ब्राह्मण २.८.२.७ के अनुसार रव का उपयोग तम को दूर करने के लिए किया जा सकता है । ऋग्वेद ७.३३.४ व ९.९७.३६ में बृहत् रव का उल्लेख है जिसके द्वारा इन्द्र में शुष्म/बल को धारण कराया जाता है । यह कहा जा सकता है कि रव/लव का कार्य मर्त्य स्तर पर स्मृति को श्रुति द्वारा पुष्ट करना है जिसकी पुष्टि के लिए ऋग्वेद १०.९४.१२ को उद्धृत किया जा सकता है । वाल्मीकि रामायण में सीता के पुत्रों के रूप में कुश व लव का समावेश किया है । लव की राजधानी श्रावस्ती है - श्रवण की, स्मृति की स्थिति । कुश की नगरी दक्षिण कोशल और लव की उत्तरकोशल है । उत्तर स्थिति डा. फतहसिंह के अनुसार वृत्र वध के पश्चात् आनन्द की स्थिति होती है ।

 

संदर्भ

*काल परमाणु ही लव है। नीचे-ऊपर रक्खे हुए कमलपत्रों को एक साथ ही सुई से भेदन करने पर प्रत्येक दल में जितना काल लगता है, उसी की संज्ञा लव है। कहा जाता है कि इससे सूक्ष्मकाल की उपलब्धि नहीं होती। दो सौ छप्पन लवों की एक मात्रा होती है। बिन्दु का उच्चारणकाल एक सौ अट्ठाईस लव है। अर्द्धचन्द्र का चौंसठ, रोधिनी का बत्तीस, नाद का सोलह, नादान्त का आठ, शक्ति का चार, व्यापिका का दो और समना का एक लव होता है। उन्मना सर्वथा कालहीन है। - शिवशंकर अवस्थी, मन्त्र और मातृकाओं का रहस्य, पृष्ठ ५७ (चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी, १९८६)