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पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

( Ra, La)

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Yogalakshmi - Raja  (Yogini, Yogi, Yoni/womb, Rakta/blood, Raktabeeja etc. )

Rajaka - Ratnadhaara (Rajaka, Rajata/silver, Raji, Rajju, Rati, Ratna/gem etc.)

Ratnapura - Rathabhrita(Ratnamaalaa, Ratha/chariot , rathantara etc.)

Rathaswana - Raakaa (Rathantara, Ramaa, Rambha, Rambhaa, Ravi, Rashmi, Rasa/taste, Raakaa etc.) 

Raakshasa - Raadhaa  (Raakshasa/demon, Raaga, Raajasuuya, Raajaa/king, Raatri/night, Raadhaa/Radha etc.)

Raapaana - Raavana (  Raama/Rama, Raameshwara/Rameshwar, Raavana/ Ravana etc. )

Raavaasana - Runda (Raashi/Rashi/constellation, Raasa, Raahu/Rahu, Rukmaangada, Rukmini, Ruchi etc.)

Rudra - Renukaa  (Rudra, Rudraaksha/Rudraksha, Ruru, Roopa/Rupa/form, Renukaa etc.)

Renukaa - Rochanaa (Revata, Revati, Revanta, Revaa, Raibhya, Raivata, Roga/disease etc. )

Rochamaana - Lakshmanaa ( Roma, Rohini, Rohita,  Lakshana/traits, Lakshmana etc. )

Lakshmi - Lava  ( Lakshmi, Lankaa/Lanka, Lambodara, Lalitaa/Lalita, Lava etc. )

Lavanga - Lumbhaka ( Lavana, Laangala, Likhita, Linga, Leelaa etc. )

Luuta - Louha (Lekha, Lekhaka/writer, Loka, Lokapaala, Lokaaloka, Lobha, Lomasha, Loha/iron, Lohit etc.)

 

 

 

 

Manifestation Process of Self Knowledge

-         Radha Gupta

In previous article, it was made clear that manifestation of Rama is the manifestation of Self Knowledge and this knowledge of Self(I am soul, not a body) manifests only through a pure, peaceful and stable mind called Dasharatha.

            To describe it’s process, now the story tells that this pure, peaceful and stable mind strongly desires to know his own real self and being inspired by his inner consciousness, this pure and stable mind again moves towards attaining higher purity called Ashvamedha yagna.

            Slowly a very beautiful, shining thought immerges in consciousness symbolized as Praajaapatya Purusha. This shining thought makes mind aware of the truth that true Self always lies within. It is the energy or soul(Payas) situated in the golden chamber(Hiranyamaya Kosha) which a person forgets in the long journey of birth and death. Therefore we should be aware and remember this.

            As soon as pure, peaceful and stable mind digests this truth(Payas) through his three powers – Kaushalyaa, Sumitraa and Kaikai., knowledge of self(Rama) manifests with three more powers called Lakshmana, Bharata and Shatrughna simultaneously.

            When a person knows his own self as energy or soul, he immediately knows himself a creator of his thoughts through his creative power called mind. Now, in every situation, he becomes able to choose and create desired kind of thought. This power is called Lakshmana.

            Secondly, knowing himself as an energy in soul, a person automatically associates with the qualities of soul such as love, happiness, bliss, peace, purity and knowledge. This power is called Bharata.

            Thirdly, knowing himself a loveful, happy, blissful, peaceful, powerful, pure soul, a person easily destroys all the evils. This power is called Shatrughna.

            The secret of unequal distribution of energy (Payas) stated in the story is clarified through the above manifestation.

 

राम रूप आत्मज्ञान के अवतरण की प्रक्रिया का चित्रण

- राधा गुप्ता

रामायण कथा के अन्तर्गत राम के अवतरण की जो प्रक्रिया वर्णित है, वह वास्तव में आत्मज्ञान के अवतरण की प्रक्रिया को ही इंगित करती है। राम के पूर्वज शीर्षक के अन्तर्गत हम स्पष्ट कर चुके हैं कि मनश्चेतना की विवस्वान्(वासना रहित स्थिति) , इक्ष्वाकु(अन्तर्दर्शन), ककुत्स्थ(श्रेष्ठ विचारों का संधारण) तथा रघु(विपरीत स्थितियों का सहज अतिक्रमण) नामक स्थितियों को पार करके ही चेतना दशरथ स्थिति को प्राप्त होती है। दशरथ अयोध्यापति हैं और अयोध्यापति दशरथ का अर्थ है – मन की शुद्ध, शान्त, स्थिर स्थिति। दशरथ(दश – रथ) शब्द दश और रथ से बना है जिसका अर्थ है – दस इन्द्रियों – 5 ज्ञानेन्द्रियों तथा 5 कर्मेन्द्रियों – के रथ पर बैठने वाला मन तथा अयोध्या( अ – योध्या) शब्द किसी प्रकार के युद्ध अर्थात् कलुषता, अशुद्धता, अस्थिरता आदि से रहित शुद्ध व्यक्तित्व को इंगित करता है। अतः शुद्ध, शान्त, स्थिर व्यक्तित्व का स्वामी शुद्ध – शान्त – स्थिर मन ही अयोध्यापति दशरथ कहलाता है। अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या कथन से उपर्युक्त तथ्य ही स्पष्ट होता है। मन की यह शुद्ध, शान्त तथा स्थिर स्थिति(दशरथ) ही राम रूप आत्मज्ञान के प्राकट्य के लिए उपयुक्त आधारभूमि है। इस आधारभूमि में राम रूप आत्मज्ञान के प्रकटन की प्रक्रिया को वाल्मीकि रामायण में यद्यपि बहुत विस्तार से वर्णित किया गया है, परन्तु कथा का संक्षिप्त रूप यह है –

कथा का संक्षिप्त रूप

वृद्धावस्था आ जाने पर भी जब दशरथ को कोई पुत्र प्राप्त नहीं हुआ, तब पुत्र – प्राप्ति की उत्कट लालसा से उन्होंने अश्वमेध यज्ञ करने का विचार किया और वसिष्ठ तथा सुमन्त्र को अपने इस विचार से अवगत कराया। वसिष्ठ ने राजा के प्रस्ताव का अनुमोदन किया परन्तु सुमन्त्र ने कहा कि पहले आप रोमपाद राजा के यहां रहने वाला ऋष्यशृङ्ग मुनि को अयोध्या में ले आइए। वही आपका यज्ञ कराएंगे। सुमन्त्र के कथनानुसार दशरथ ऋष्यशृङ्ग को ले आए और उन्होंने पहले अश्वमेध तथा बाद में पुत्रकामेष्टि यज्ञ को सम्पन्न कराया। यज्ञ की अग्नि से एक देदीप्यमान पुरुष प्रकट हुआ जिसके हाथ में पायस से भरी हुई सोने की थाली थी और वह थाली चांदी के ढक्कन से ढंकी थी। पुरुष ने कहा कि मुझे प्रजापति लोक से आया हुआ प्राजापत्य पुरुष जानो। पुरुष ने थाली में रखा हुआ पायस दशरथ को प्रदान किया और दशरथ ने वह पायस अपनी तीनों रानियों में बांट दिया। सबसे पहले उन्होंने पायस का आधा भाग कौशल्या को दिया। फिर बचे हुए आधे भाग में से आधा भाग सुमित्रा को प्रदान किया तथा शेष बचे हुए आधे भाग में से भी आधा भाग कैकेयी को तथा आधा भाग पुनः सुमित्रा को दे दिय़ा। तीनों रानियां गर्भवती हुई और समय आने पर कौशल्या से राम का, सुमित्रा से लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न का, कैकेयी से भरत का प्राकट्य हुआ।

      सम्पूर्ण कथा प्रतीकात्मक है । अतः कथा के प्रतीकों को समझ लेने पर कथा का तात्पर्य स्वतः स्पष्ट हो जाता है ।

कथा की प्रतीकात्मकता

1-     दशरथ के भीतर पुत्र – प्राप्ति की उत्कट लालसा उत्पन्न होने का अर्थ है –

शुद्ध, शान्त, स्थिर मन में आत्मज्ञान रूप श्रेष्ठतम गुण – प्राप्ति की प्रगाढ इच्छा का जाग्रत होना। पौराणिक साहित्य में पुत्र शब्द सर्वत्र गुण का वाचक है। आत्मज्ञान अर्थात् मैं अजर-अमर-अविनाशी आत्मा हूं – इस रूप में अपने वास्तविक स्वरूप को जान लेना एक श्रेष्ठतम गुण है।

2-     दशरथ के भीतर अश्वमेध यज्ञ करने का विचार जाग्रत होने का अर्थ है –

शुद्ध, शान्त, स्थिर मन(मनुष्य) का आत्मज्ञान की प्राप्ति हेतु अपने मन को अधिक से अधिक श्रेष्ठ स्वरूप प्रदान करने के विचार से युक्त होना। अश्वमेध(अश्व – मेध) शब्द का अर्थ है – मन को श्रेष्ठ बनाना। अतः आत्मज्ञान का अवतरण तभी संभव है जब शुद्ध, शान्त, स्थिर मन (मनुष्य) आत्मज्ञान हेतु मन को श्रेष्ठ बनाने की दिशा में सतत् प्रयासरत रहे।

3-     वसिष्ठ द्वारा अश्वमेध यज्ञ का अनुमोदन

वसिष्ठ शब्द ऊर्ध्वमुखी चेतना का वाचक है अर्थात् जो चेतना मनुष्य मन को सर्वदा ऊंचाई की ओर ले जाना चाहती है, वह वसिष्ठ कहलाती है। शुद्ध, शान्त, स्थिर मन(दशरथ) इस ऊर्ध्वमुखी चेतना(वसिष्ठ) से सदैव संयुक्त रहता है और वसिष्ठ चेतना भी मन की श्रेष्ठता के लिए (अश्वमेध यज्ञ के लिए) सदैव उत्सुक तथा तत्पर रहती है। इसे ही कथा में यह कहकर इंगित किया गया है कि दशरथ ने जब वसिष्ठ के समक्ष अश्वमेध यज्ञ करने का विचार प्रस्तुत किया, तब वसिष्ठ ने उसका अनुमोदन किया।

4-     रोमपाद तथा ऋष्यशृङ्ग

राजा रोमपाद(रोम – पात) का अर्थ है – रोमांच से रहित शान्त जीवात्मा। ऋष्यशृङ्ग मुनि अन्तःस्फुरित चेतना को इंगित करते हैं। अन्तः – स्फुरित चेतना का अर्थ है – किसी भी कार्य को सम्पन्न करने के लिए मनुष्य की अपनी चेतना में उस कार्य को करने की स्फुरणा(इच्छा और प्रेरणा) होना और शान्त अन्तस्तल में(राजा रोमपाद के राज्य में) विद्यमान इस स्फुरणा का व्यक्तित्व के तल पर भी प्रकट होना । इसे ही कथा में ऋष्यशृङ्ग मुनि को रोमपाद राजा के राज्य से अयोध्या में लाना कहकर इंगित किया गया है।

5-     सुमन्त्र का अर्थ है – श्रेष्ठ मन्त्रणा।

शुद्ध, शान्त, स्थिर मन(दशरथ) को किसी बाह्य मन्त्रणा की आवश्यकता नहीं होती। वह आन्तरिक श्रेष्ठ मन्त्रणा से युक्त होता है। यह आन्तरिक मन्त्रणा(सुमन्त) ही मन(दशरथ) को परामर्श देती है कि जो भी कार्य तुम करने जा रहे हो – वह अन्तःस्फूर्त चेतना से प्रेरित होकर होना चाहिए, किसी बाह्य प्रभाव से प्रेरित होकर नहीं, क्योंकि कभी – कभी ऐसा भी होता है कि मनुष्य किसी व्यक्ति अथवा स्थिति के संग से अल्पकालिक आवेश में आकर कार्य को प्रारम्भ तो कर देता है परन्तु अपने भीतर की स्फुरणा न होने के कारण वह कार्य सम्पन्न नहीं हो पाता। इस तथ्य को ही कथा में यह कहकर इंगित किया गया है कि सुमन्त्र ने दशरथ को ऋष्यशृङ्ग मुनि को अयोध्या में लाने तथा अश्वमेध यज्ञ कराने का परामर्श दिया।

6-     यज्ञ की अग्नि का अर्थ है –

आत्मज्ञान प्राप्ति की दिशा में प्रयत्नशील मनुष्य के भीतर प्रज्वलित चेतना रूप अग्नि।

7-     यज्ञ की अग्नि से प्राजापत्य पुरुष के प्राकट्य का अर्थ है – प्रज्वलित मनश्चेतना रूप अग्नि से एक प्रखर, तेजस्वी, देदीप्यमान विचार का प्रकट होना। प्राजापत्य का अर्थ है – प्रजापति से उत्पन्न और प्रजापति का अर्थ है – प्रजाओं का पति। आध्यात्मिक स्तर पर मनुष्य के संकल्प, विचार, इच्छाएं तथा भावनाएं ही उसकी प्रजाएं कहलाती हैं और इन प्रजाओं का पति है – इसका अपना मन अथवा संकल्पों को रचने की उसकी शक्ति। इसी रचना शक्ति से मनुष्य एक अत्यन्त प्रभावी, तेजस्वी एवं देदीप्यमान विचार को रचता है जिसे कथा में सूर्य के समान देदीप्यमान और अग्नि के समान तेजस्वी प्राजापत्य पुरुष कहा गया है।

8-     स्वर्ण की थाली –

स्वर्ण की थाली मनुष्य के हिरण्ययकोश को इंगित करती है।

9-     पायस

पायस शब्द हिरण्यय कोश में विद्यमान आनन्दपूर्ण आत्मा(blissful soul) को इंगित करता है। पायस का सामान्य अर्थ है – खीर, जो पयः(दुग्ध) और अक्षत(चावल) के मिश्रण से तैयार होती है। आध्यात्मिक दृष्टि से आनन्दमय कोश की चेतना पयः (दुग्ध) कहलाती है और अक्षत(अ – क्षत अर्थात् जो कभी विनष्ट नहीं होता) तो केवल आत्मा ही है। इस प्रकार आध्यात्मिक स्तर पर पायस का अर्थ हुआ – आनन्दपूर्ण आत्मा।

10- सोने की थाली में रखी पायस चांदी के ढक्कन से ढकी होने का अर्थ है –

अपने ही हिरण्यय कोश में विद्यमान आनन्दपूर्ण आत्मा का विस्मृति के ढक्कन से ढक जाना। जैसे चांदी नामक धातु समय के प्रभाव से प्रभावित होकर कालिमा से ढंक जाती है, उसी प्रकार जन्म – जन्मान्तरों की यात्रा में देहभाव में बंधकर आत्मा भी, जो मनुष्य का अपना स्वरूप है – विस्मृति रूपी कालिमा से ढक जाती है।

11- प्राजापत्य पुरुष द्वारा दशरथ को पायस देने का अर्थ है – मनश्चेतना में प्रकट हुए एक प्रखर, तेजस्वी एवं देदीप्यमान विचार का मनुष्य मन(दशरथ) को इस भाव से भर देना कि तुम ही हो आनन्दपूर्ण आत्मा।

12-  दशरथ की तीन रानियां मन की तीन शक्तियों को इंगित करती हैं। मन की ज्ञानशक्ति कौशल्या है, क्रियाशक्ति सुमित्रा है तथा भावशक्ति या इच्छाशक्ति कैकेयी है।

13-  पायस ग्रहण कर रानियों के गर्भवती होने का अर्थ है –

मनःशक्तियों द्वारा इस आत्म – विचार को पूर्णतः आत्मसात् कर लेना कि मैं आनन्दपूर्ण आत्मा ही हूं।

   14- एक पुत्र के स्थान पर 4 पुत्रों की प्राप्ति –

एक पुत्र के स्थान पर 4 पुत्रों की प्राप्ति इस आध्यात्मिक सत्य को इंगित करती है कि आत्मज्ञान के अवतरण के साथ तीन अन्य गुणों का अवतरण भी अवश्यम्भावी है।

      जैसे ही मनुष्य को यह ज्ञान होता है कि मैं देह नहीं हूं अपितु इस देह को चलाने वाली एक शक्ति हूं, आत्मा हूं – वैसे ही उसे तत्काल यह भी समझ में आ जाता है कि मैं शक्ति ही तो मन(creative power) होकर संकल्पों  (thoughts) की रचना करती हूं। अतः अपने समस्त संकल्पों की रचयिता मैं शक्ति(आत्मा) ही हूं। अब प्रत्येक स्थिति – परिस्थिति में मैं आत्मा अथवा शक्ति जैसा चाहूं, वैसा संकल्प रचकर अपने भाग्य की निर्माता हो सकती हूं। यह ज्ञान अर्थात् विचारों का निर्माता होना ही लक्ष्मण नामक पुत्र का अवतरण है।

      आत्मज्ञान के साथ ही साथ यह ज्ञान भी अवतरित होता है जब मैं आत्मा ही हूं, तो आत्मा के गुणों(सुख, शान्ति, प्रेम आदि) से भी मैं स्वाभाविक रूप से ओतप्रोत हूं और इन गुणों को बांटना ही मुझ आत्मा के जीवन का उद्देश्य है। आत्म – गुणों की यह सहज स्वाभाविक स्थिति ही भरत नामक पुत्र का अवतरण है।

      आत्मज्ञान के साथ ही साथ यह ज्ञान भी अवतरित होता है कि जब मैं आत्मा सुख – शान्ति – शुद्धता – प्रेम आदि आत्म – गुणों से स्वभावतः ओतप्रोत हूं, तब मैं आत्मा देहभाव के कारण उत्पन्न होने वाले सभी नकारात्मक विचारों, भावों अथवा संकल्पों रूपी शत्रुओं का भी नाश करने में समर्थ हूं। इसे ही शत्रुघ्न का अवतरण कहकर इंगित किया गया है।

15- पायस का असमान वितरण

आत्मज्ञान के अवतरण के साथ क्रमशः अवतरित हुए उपर्युक्त वर्णित तीन गुणों के आधार पर ही पायस के असमान वितरण के रहस्य को सहज रूप से समझा जा सकता है।

16- पुत्रों के प्राकट्य हेतु माताओं का चयन

कौशल्या ज्ञानशक्ति है, इसलिए शम रूप आत्मज्ञान को कौशल्या से सम्बद्ध किया गया है। सुमित्रा क्रियाशक्ति है, इसलिए रचनात्मक और संहारक क्रियाशक्तियों अर्थात् संकल्पों को रचने वाली शक्ति लक्ष्मण तथा शत्रुविनाशक शक्ति शत्रुघ्न को सुमित्रा से सम्बद्ध किया गया है। कैकेयी भावशक्ति है, इसलिए सुख – शान्ति – शुद्धता – प्रेम – आनन्द प्रभृति आत्मभावों को कैकेयी से सम्बद्ध किया गया है।

 

प्रथम लेखन – 25-2-2011 ई.( फाल्गुन कृष्ण अष्टमी, विक्रम संवत् 2067)